Contribution of Nava Nalanda Mahavihara to the enrichment of the Indian Knowledge Tradition. : भारतीय ज्ञान परम्परा के संवर्धन में नव नालन्दा महाविहार का योगदान

For referencing : Ankit Dwivedee, Nava Nalanda Mahavihara Ka Bhartiya Gyan Parampara Me Yogdan (Buddhism : A Critical Miscellany, New Bhartiya Book Corp. Ltd., New Delhi, 2025), ISBN 978-81-8315-612-7, Page No. 18-24, Book Editor :- Prof. Rana Purushottam Kumar Singh (NNM)





शोध सार :- 


भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा ने सम्पूर्ण जगत को प्रभावित किया है। यह सतत् प्रवाहित परम्पराओं में से एक है। वैदिक काल से लेकर जैनबुद्ध और यहाँ तक की आज 21वीं सदी  में भी यह परम्परा विचारतर्कसाधना और आत्मबोध के रूप में विकसित होने के साथ-साथ चलायमान है। प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय (श्री नालन्दा महाविहार) इस परम्परा का एक गौरव है, जिसने ज्ञान-विज्ञान से धर्म-संस्कृति और मानव कल्याण को सुदृढ़ किया। उसी परम्परा को पुनर्जीवित करने और संवर्धित करने के लिए भारत के आजादी के उपरान्त नव नालन्दा महाविहार की स्थापना हुई। यह शोधपत्र नव नालन्दा महाविहार के 75 वर्षों की सतत् यात्रा का एक समग्र अध्ययन प्रस्तुत करेगा, जिससे इस संस्थान के महत्त्व को भारतीय ज्ञान परम्परा में समझा जा सकेगा। साथ ही साथ नव नालन्दा महाविहार की स्थापना, उद्देश्यशैक्षणिक योगदान व सांस्कृतिक महत्त्व को भी रेखांकित किया जा सकेगा।


बीज शब्द :-  श्री नालन्दा महाविहारनव नालन्दा महाविहारनालन्दा विश्वविद्यालयनालन्दा खुला विश्वविद्यालयनालन्दा, भारतीय ज्ञान परम्परा, बौद्ध, पालि, संस्कृति, महाविहार


प्रस्तावना :- 


यह सर्वविदित है कि प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय (श्री नालन्दा महाविहार) की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (414-455) के काल में हुई। यहाँ यह जानना महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि महाविहार क्या है बौद्ध अध्ययन में छोटे आवास के संदर्भ में विहार और बड़े आवास के रूप में महाविहार शब्द का प्रयोग मिलता है। अत: विश्वविद्यालय को भी बौद्ध परिवेश में महाविहार के रूप में लिखा जाता रहा है। इसलिए श्री नालन्दा महाविहारविक्रमशिला महाविहारओदन्तपुरी महाविहार व अन्य नामित रहे हैं । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केन्द्र बौद्ध विशेष था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र और जैन साहित्य से यह पता चलता है कि नालन्दा का विकास राजगृह (वर्त्तमान राजगीर) के बहिरिका के रूप में हुआ है।जो कि उस कालखण्ड में व्यापार और वाणिज्य का प्रमुख केन्द्र था (उत्तरापथ से जुड़ाव के कारण)। बौद्ध साहित्य (दीघनिकाय) के अनुसार राजगृह के पास नालन्दा एक ग्राम है जहाँ पावारिक आम्रवन विहार हैं। यह जानना आवश्यक हो जाता है कि श्री नालन्दा महाविहार महायान परम्परा का प्रमुख केन्द्र थाजहाँ संस्कृत भाषा की प्रधानता थी। यहाँ न केवल बौद्ध विद्या बल्कि चिकित्साधातुकर्म विज्ञानव्याकरणखगोल विज्ञान और तत्वमीमांसा इत्यादि भी पढाएं जाते थे। लेकिन 12वीं शताब्दी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी द्वारा इसे जलाकर नष्ट कर दिया जाता हैं। भारत की आजादी के उपरान्त भारत गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डाॅ राजेन्द्र प्रसाद व पूज्य भिक्षु जगदीश कश्यप के पहल पर नव नालन्दा महाविहार की नींव रखी गई ताकि पुराने श्री नालन्दा महाविहार के ज्ञान परम्परा को पुनर्जीवित किया जाए। 


नालन्दा विश्वविद्यालय के नाम को लेकर अस्पष्टता - 


ज्ञातव्य है कि नालन्दा विश्वविद्यालय के नाम को लेकर सामान्य लोग अक्सर अस्पष्ट हैं। तो बताते चलें कि नालन्दा में नालन्दा नाम से चार (4) विश्वविद्यालय है। इसके अतिरिक्त दो (२) महाविद्यालय (नालन्दा महाविद्यालय व नालन्दा महिला महाविद्यालय - दोनों बिहारशरीफ में है) भी है। इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध नालन्दा इंज़िनरिंग कॉलेज, चण्डी (नालन्दा) व नालन्दा मेडिकल कॉलेज राजधानी पटना में स्थित है। बहरहाल हम बात कर रहे हैं विश्वविद्यालय की। सबसे पहले जिसे हम प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय कहते हैं अर्थात् श्री नालन्दा महाविहारजिसकी स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त द्वारा 5वीं शताब्दी में हुई। दूसरा नव नालन्दा महाविहार, जिसकी स्थापना तत्कालीन भारत के राष्ट्रपति डाॅ राजेन्द्र प्रसाद व पूज्य भिक्षु जगदीश कश्यप के सहयोग से 1951 में हुई। तीसरा नालन्दा खुला (ओपॅन) विश्वविद्यालय, जिसकी स्थापना तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री श्री बिन्देश्वरी दुबे के सहयोग से 1987 में हुई। इसके उपरान्त तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ एपीजे अब्दुल कलाम व मुख्यमंत्री बिहार श्री नीतीश कुमार के सहयोग से नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना 2010 में हुई। यह भी जानना आवश्यक है कि नालन्दा जिला का नाम है, जिसका मुख्यालय बिहारशरीफ (विहार श्री) है। राजगीर, नालन्दा जिले का एक अनुमंडल है। बिहारशरीफ (विहार श्री) और राजगीर दोनों की दूरी 23 किलोमीटर है। जिसके मध्य एक रेलवे स्टेशन है नालन्दा। यह हैरान करने वाली बात है कि नालन्दा में नालन्दा नाम से कोई स्थान नहीं है। नालन्दा के नाम पर आपको नालन्दा मोड़/द्वार (जो सांकेतिक नालन्दा है) मिलेगा जो कि कुल गांव में है। श्री नालन्दा महाविहार (प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय) जो कि सूरजपुर गांव में है। नव नालन्दा महाविहार जो कि कपटिया गाँव में है। नालन्दा खुला विश्वविद्यालय भी कपटिया गांव में है। यह तीनों विश्वविद्यालय आस पास ही है। चौथा विश्वविद्यालय नालन्दा विश्वविद्यालय जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया वह  इन तीनों से 1किलोमीटर दूर राजगीर में स्थित (पिलखी गाँव) है। वर्त्तमान में श्री नालन्दा महाविहार का पुरावशेष (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षणसंस्कृति मंत्रालयभारत सरकार) के अंतर्गत है। नव नालन्दा महाविहार (संस्कृति मंत्रालयभारत सरकार) के अंतर्गत सम विश्वविद्यालय है। नालन्दा खुला विश्वविद्यालय (जिसका पहले मुख्यालय पटना विस्कोमान भवन में था) वह बिहार राज्य सरकार का खुला विश्वविद्यालय है। नालन्दा विश्वविद्यालयराजगीर एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है जो विदेश मंत्रालय, भारत सरकार के अन्तर्गत है।


नव नालन्दा महाविहार की स्थापना 


स्वतन्त्र भारत के उपरान्त प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय (श्री नालन्दा महाविहार) के पुनर्स्थापित और जीवन्त करने का गौरव भिक्षु जगदीश कश्यप (तत्कालीन शिक्षक पालिनालन्दा महाविद्यालयबिहारशरीफ) और डाॅ राजेन्द्र प्रसाद (तत्कालीन राष्ट्रपतिभारत गणराज्य) के सकारात्मक संबंध व प्राच्य विद्या के प्रोत्साहन के संस्कारों को जाता है। जून 16,1951 को तत्कालीन मुख्यमंत्री बिहारडाॅ श्रीकृष्ण सिन्हा यह प्रस्ताव पास करते हैं और नव नालन्दा महाविहार सर्वप्रथम अपने पहले स्वरूप “मगध इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट स्टडीज एंड रिसर्च इन पालि एंड अलाइड लैंग्वेजेज एंड बुद्धिस्ट लर्निंग” के रूप में स्थापित होता है। भिक्षु जगदीश कश्यप ने संस्थापक निदेशक (1951-1955) के दायित्व का निर्वहन किया। ज्ञात हो कि इसकी शुरूआत राजगीर के एक किराये के भवन में हुई और 1953 में इसे कपटिया गाँव में स्थानान्तरित किया गया। हालांकि इसका शिलान्यास नवंबर 20, 1951 में कपटिया में डाॅ राजेन्द्र प्रसाद द्वारा किया जा चुका था। शुरूआती दौर में इसकी संबद्धता पटना विश्वविद्यालय लेकिन बाद में इसे मगध विश्वविद्यालयबोधगया और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयदरभंगा से प्राप्त हुई। भौगोलिक दृष्टिकोण से भी यह संस्थान काफी महत्त्वपूर्ण हैइसकी स्थापना श्री नालन्दा महाविहार के समीप ऐतिहासिक इन्द्रपुष्करिणी (तालाब) के दक्षिणी छोर पर हुआ है और उत्तरी छोर प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय (श्री नालन्दा महाविहार) की सीमा मानी जाती हैं। अर्थात् इन्द्रपुष्करिणी के उत्तरी छोर पर श्री नालन्दा महाविहार और दक्षिणी छोर पर नव नालन्दा महाविहार। यह बताना अनिवार्य हो जाता है कि इसके लिए एकड़ 93 डिसमील जमीन उस समय के इस्लामपुर (नालन्दा) के मुस्लिम जमींदार जनाब चौधरी जहूर ने दिया था। इस संस्थान के पहले भवन का निर्माण (शिल्प का कार्य पद्मश्री उपेंद्र महारथी द्वारा किया गया) 1956 में पूरा हुआ जिसका उद्घाटन तत्कालीन उप-राष्ट्रपति भारत गणराज्य डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने मार्च 20, 1956 में किया। भवन निर्माण होते ही इसी साल जुलाई 301956 में ही बिहार सरकार द्वारा नामकरण नव नालन्दा महाविहार किया गया।


नव नालन्दा महाविहार का विकास


शुरूआती दौर में बतौर शोध संस्थानइस संस्थान ने संपूर्ण पालि त्रिपिटक को देवनागरी में लिप्यान्तरण करने का बीड़ा भिक्षु जगदीश कश्यप के नेतृत्व में उठाया। उसके बाद 1955 प्रो. सतकरी मुखर्जी ने बतौर निदेशक कार्यभार संभाला तथा शिक्षण और शोध कार्य को और गति दी। लिहाजा शुरूआती महत्त्वपूर्ण शोधकार्य उनके द्वारा संपादित हुए। विदेशी छात्र-छात्राओं के बढ़ते रूचि को देखते हुए संस्थान ने अंतरराष्ट्रीय छात्रावास का प्रस्ताव लायाजिसका शिलान्यास तत्कालीन राष्ट्रपति श्री नीलम संजीव रेड्डी ने जनवरी 20, 1981 को किया। इसी वर्ष संस्थान के निरंतर प्रगति और कार्य से प्रभावित होकर तत्कालीन राज्यपाल बिहार डाॅ ए.आर. किदवई ने इसे अप्रैल 30, 1981 में स्वायत्त संस्थान का दर्जा दे दिया तथा इसके शोध व शिक्षण कार्य को गति देने के लिए 1982 में प्रसिद्ध जर्मन प्राच्यविद् डाॅ गुस्तव रोथ को संस्थान का निदेशक बनाया गया। डाॅ रोथ ने संस्थान को सम विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने की आवाज उठाईजिसका प्रस्ताव तत्कालीन राज्यपाल डाॅ किदवई ने बढ़ाया तथा केन्द्र सरकार के सहयोग की अपेक्षा की और दिसम्बर 4, 1990 में संस्कृति विभागमानव संसाधन विकास मंत्रालयभारत सरकार को स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया। लिहाजा वर्ष बाद केन्द्र सरकार ने यह प्रस्ताव स्वीकार करते हुए फरवरी 25, 1994 को इसका संपूर्ण उत्तरदायित्व ले लिया और संस्थान का पंजीयन सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम XXIX 1860 के अंतर्गत संपन्न हुआ। निरंतर संवाद और संस्थान के निदेशक प्रो. रविन्द्र पंत के प्रयास से नवंबर 132006 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अनुशंसा पर मानव संसाधन विकास मंत्रालयभारत सरकार ने इसे सम विश्वविद्यालय का दर्जा दिया। संस्थान अपने 75वें वर्ष की यात्रा में है और केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा पाने को प्रयासरत है।


नव नालन्दा महाविहार का वैशिष्टय  


  • इस संस्थान अपने शोध कार्य के साथ-साथ अपनी विशिष्ट गतिविधियों की वजह से बौद्ध जगत के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परम्परा में अपनी विशिष्टता प्राप्त किया है। सर्वप्रथम संपूर्ण पालि त्रिपिटक का समालोचनात्मक देवनागरी संस्करण इस संस्थान से ही भिक्षु जगदीश कश्यप के नेतृत्व में प्रकाशित हुआ।कई महत्त्वपूर्ण पालि ग्रंथो का अनुलेखन व संपादन का कार्य संपन्न हुआ। पालि हिन्दी शब्दकोश के प्रथम भाग के प्रथम खंड का विमोचन मई 22007 में तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने कियाइसका दूसरे (नवंबर 132009) और तीसरे (अगस्त 112011) खंड का विमोचन तत्कालीन राज्यपाल बिहार श्री देवानंद कुँवर द्वारा किया गया। इसी शब्दकोश के द्वितीय भाग प्रथम खंड का विमोचन जनवरी 292014 को केन्द्रीय संस्कृति मंत्री श्रीमती चन्द्रेश कुमारी द्वारा और द्वितीय खंड का विमोचन तत्कालीन राज्यपाल श्री रामनाथ कोविंद और केन्द्रीय संस्कृति मंत्री स्वतंत्र प्रभार श्री महेश शर्मा द्वारा अप्रैल 92016 को किया गया। तृतीय खंड का विमोचन फरवरी 222020 को केन्द्रीय संस्कृति मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल द्वारा किया गया। पालि शब्दकोश के सभी खंडों का कार्य संपन्न हो चुका हैं। अंतिम खंड का विमोचन नवंबर 20, 2025 को केंद्रीय संस्कृति मंत्री श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत द्वारा किया गया। यहाँ की देशरत्न डाॅ राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय पुस्तकालय भी प्राच्य विद्या व बौद्ध विद्या के दृष्टिकोण से अत्यंत समृद्ध हैं वर्त्तमान में यहाँ लगभग 70 हजार से ऊपर पुस्तके और 221 पांडुलिपियाँ उपलब्ध हैं। जिसके अंतर्गत विशेष रूप से स्वर्ण लिखित आर्य अष्टसहस्र प्रज्ञापारमिता सूत्रतालपत्र में लिखित विसुद्धिमग्गकेले के थम्भ पर लिखित पालि व्याकरणलाह से लिखित वर्मी भाषा में कम्मा-वाचा जैसे प्राचीन ग्रंथ शामिल हैं। इस संस्थान की ख्याति के साथ-साथ, देश विदेश के संस्थानों व आचार्यों की गहरी आस्था है लिहाजा इस संस्थान को कई महत्त्वपूर्ण दस्तावेजपांडुलिपियाँ व पुस्तके नि:शुल्क पुस्तकालय में उपयोग हेतु उपलब्ध हैं। 
  • नव नालंदा महाविहार को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बिहार  का पहला पाण्डुलिपि क्लस्टर केन्द्र बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। संस्कृति मंत्रालय की प्रमुख पहल ज्ञान भारतम् 2025” के अंतर्गत देशभर से चयनित 10 क्लस्टर केन्द्रों तथा 7 स्वतंत्र केन्द्रों के साथ समझौता ज्ञापन (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए। जिसके अन्तर्गत भारत की प्राचीन पाण्डुलिपि धरोहर के संरक्षण और डिजिटलीकरण का कार्य किया जा सके। ज्ञात हो कि क्लस्टर केन्द्र इस परियोजना की सर्वोच्च श्रेणी का केन्द्र होता है। इस रूप में नव नालंदा महाविहार को बिहार की दुर्लभ पाण्डुलिपियों के संरक्षणसंवर्धन और डिजिटलीकरण की ज़िम्मेदारी और अवसर दोनों प्राप्त हुए हैं।” स्वतंत्र केन्द्र केवल अपनी स्वयं की पाण्डुलिपि-संपदा के संरक्षण और डिजिटलीकरण के लिए उत्तरदायी होते हैंजबकि क्लस्टर केन्द्र व्यापक क्षेत्रीय दायित्व निभाते हैं।
  • प्राचीन नालन्दा की वाद परम्परा को जीवन्त करने हेतु इस संस्थान द्वारा 2006 से आयोजित नालन्दा डायलॉग काफी महत्त्वपूर्ण आयोजन माना जाता रहा है। जिसके अंतर्गत बौद्ध दर्शन व विज्ञान के अध्येताओ के मध्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर तर्क-वितर्क होता है। जिसके अंतर्गत IIT, IIS, AIMS, NIAS तथा देश के अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों  व विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक, विद्वान व वैज्ञानिक शामिल होते हैं। नालन्दा डायलॉग का भाग महाविहार द्वारा प्रकाशित हैं। इस संस्थान से प्रतिष्ठित श्री नालन्दा पत्रिका भी प्रकाशित  होती है।
  • शैक्षणिक परिसर के अलावा इस संस्थान का 52 एकड़ का एक सांस्कृतिक परिसर भी है, जो इसके वैशिष्ट्य का प्रमुख केन्द्र बिन्दु है। इस सांस्कृतिक परिसर में श्वेनसांग स्मृति भवननालन्दा शिल्प ग्रामधम्म नालन्दा विपश्यना केन्द्र, ओपनएयर थियेटर और हर्बल पार्क निर्मित है। सांस्कृतिक ग्राम, नालन्दा की कलाशिल्प को बढ़ावा देने के साथ-साथ आसपास के लोगो को रोजगार भी उपलब्ध कराता हैं। श्वेनसांग स्मृति भवन चीनी यात्री श्वेनसांग की  स्मृति में बनाई गयी है। इस संस्थान के पूर्व निदेशक पूज्य भिक्षु जगदीश कश्यप की पहल से जनवरी 121957 को कार्यक्रम में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पूज्य दलाई लामा और पूज्य पंछेन लामा से स्मृति भवन के लिए चीनी प्रधानमंत्री के प्रतिनिधित्व में धनादेश और श्वेनसांग का अस्थि कलश प्राप्त किया था। स्मृति भवन निर्माणाधीन है जिसकी वजह से वर्तमान में यह कलश पटना के संग्रहालय में रखा गया है। वर्तमान में यह भवन बौद्ध पर्यटन का एक मुख्य केंद्र है। 2014 में शुरू हुई धम्म नालन्दा विपश्यना केन्द्र संपूर्ण भारत व अन्य देशों में काफी प्रचलित और लोकप्रिय है। इसके अंतर्गत प्रतिमाह 2-13 तारीख तक विपश्यना साधना, श्री सत्यनारायण गोयंका जी द्वारा नियुक्त आचार्यों द्वारा करायी जाती है जो कि पूर्णत: नि:शुल्क है। अब तक लगभग 35 से अधिक देशों के 4 हजार से ऊपर लोगों ने यहाँ साधना की है। इस कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ गोविन्द (तत्कालीन राज्यपाल, बिहार) भी 2015 में शामिल हो चुके हैं।
  • पालि और बौद्ध अध्ययन के लिए आज भी यहाँ विदेशी छात्र-छात्राओं का विशेष रूझान रहता है, वर्तमान में भी यहाँ 100 से अधिक विदेशी छात्र-छात्राएँ अध्ययनरत हैं। तमाम एशियाई देशों के छात्र-छात्राएँ यहाँ पढ़ चुके है। इसके अतिरिक्त 1966 में लाओस के राजकुमार वांग सावोंग2008 में पूज्य थिक नाथ हन्ह (वियतनाम) एवं पूज्य डाॅ अशिन न्यानिसार (म्यांमार) यहाँ से विद्यावारिधि की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं।
  • अपनी पुरानी धरोहरों को संरक्षित करने के लिए यह संस्थान कई महत्त्वपूर्ण शान्ति यात्रा भी निकालता है जिसके अंतर्गत सारिपुत्त वैश्विक शान्ति यात्रामहा मोग्गलान शान्ति पद यात्रामहाप्रजापति गौतमी शान्ति यात्राजेठियन वैश्विक शान्ति यात्रामहा कस्सप शान्ति यात्रा शामिल है। कैंपस के अंतर्गत वर्षावास कार्यक्रमबुद्ध पूर्णिमा आदि के अतिरिक्त नियमित संघदान का आयोजन होता है। यह संस्थान बौद्ध परंपरा का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। संस्थान के नाम में महाविहार और इसके भवनों के नाम असोकाराम भवनआचार्य नागार्जुन संकायआचार्य शान्तरक्षित छात्रावासआचार्य शान्तिदेव छात्रावाससप्तपर्णी सभागारवालुकाराम सभागारअनाथपिण्डिक भोजनालयजीवक स्वास्थ्य केंद्र तथा आवासीय परिसर में भी भवनों के नाम बुद्धघोष संकुल, बुद्धदत्त संकुल, धम्मपाल संकुल, आनंद संकुल, उपालि संकुल, महाकास्सप संकुल, सिद्धार्थ और  तथागत भी बौद्ध परिवेश के अनुकूल हैं ।

नव नालन्दा महाविहार की वर्त्तमान स्थिति


वर्तमान में नव नालन्दा महाविहारसम विश्वविद्यालयसंस्कृति मंत्रालयभारत सरकार के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है। इसके दो परिसर, जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। शैक्षणिक परिसरसांस्कृतिक परिसरइसके अतिरिक्त इसका एक आवासीय परिसर है जहाँ कुलपतिकुलसचिव सहित शैक्षणिक और गैर-शिक्षकों के आवास है। शैक्षणिक परिसर में असोकाराम प्रशासनिक भवन है जिसके अंतर्गत कुलपतिकुलसचिवपरीक्षा नियंत्रक सहित सभी कार्यालय है। आचार्य नागार्जुन संकाय भवन में दो संकाय हैं। पहला पालि एवं अन्य भाषा 
संकाय जिसके अंतर्गत 6 विभाग आते हैं - पालिसंस्कृतहिन्दीअंग्रेजी, चीनी और जापानी। दूसरा बौद्ध अध्ययन संकाय जिसके अंतर्गत 6 विभाग - बौद्ध अध्ययन, प्राचीन भारतीय इतिहास-संस्कृति व पुरातत्त्वदर्शनशास्त्र, तिब्बती अध्ययन, योग वियश्यना और बुद्धिस्ट हेरिटेज एंड टूरिज्म मैनेजमेंट हैं । इसके अतिरिक्त एक NEP के आधारित वोकेशनल स्टडीज विभाग है जिसके अंतर्गत इन्वारेनमेंटल साइंसकंप्यूटर साइंस और पीस स्टडीज की पढ़ाई होती है। यहाँ इन सभी (चीनी, जापानी, तिब्बतन, योग वियश्यना, बुद्धिस्ट हेरिटेज एंड टूरिज्म मैनेजमेंट छोड़कर) विषयों में कला स्नातकपरास्नातक व शोध की पढाई होती है। पालि, तिब्बतीजापानीचीनी में सर्टिफिकेट व डिप्लोमा कोर्स उपलब्ध है। जबकि योग विपश्यना व बुद्धिस्ट हेरिटेज एंड टूरिज्म मैनेजमेंट में पीजी डिप्लोमा उपलब्ध हैं। थाई एफिशिएंसी कोर्स की भी शुरुआत की गई है। शोध पाठ्यक्रम में प्रवेश NET के स्कोर पर होता है और अन्य पाठ्यक्रम में महाविहार प्रवेश परीक्षा के माध्यम से। शैक्षणिक परिसर में ही तीन छात्रावास छात्राओं के लिए महामाया छात्रावासछात्रों के लिए शान्तरक्षित छात्रावास और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए शान्तिदेव छात्रावास है। कैन्टीन के रूप में अनाथपिण्डिक भोजनालयस्वास्थ्य केंद्र के रूप में जीवक स्वास्थ्य केंद्रदेशरत्न डाॅ राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय पुस्तकालय तथा नथमल टाटिया अतिथि गृह है। बताते चले कि विश्वविद्यालय का एक सुसज्जित सारिपुत्त अतिथिगृह आवासीय परिसर के पास स्थित है। इस संस्थान में सभी विषयों में शीर्ष दस छात्र-छात्राओं को 1.5 हजार प्रतिमाह छात्रवृत्ति मिलती है तथा सभी नॉन-नेट शोधार्थियों को भी विश्वविद्यालय द्वारा 10 हजार प्रतिमाह व नेट शोधार्थियों को 15 हजार प्रतिमाह  स्काॅलरशीप मिलता है। पूरे तरीके से वाई-फाई से पूर्ण यह कैंपस एक शोध संस्थान से आज 75 वर्ष की अपनी यात्रा तय कर प्राच्य विद्या और बौद्ध विद्या को संरक्षित और संवर्धित कर रहा है। स्थानीय लोगों में यह संस्थान आस्था का परिचायक भी है। नवंबर 202025 को संस्थान के 75वें स्थापना दिवस पर केन्द्रीय संस्कृति मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत के उपस्थिति में तीन योजनाओं का भी शिलान्यास हुआ, जिसके अंतर्गत एक ऑडिटोरियमएक संकाय भवन व एक दो सौ बेड का छात्रावास होगा। 

21वीं सदी में महाविहार में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का श्रेय यहाँ के पूर्व निदेशक प्रो. रविन्द्र पंत (2000-2016), श्री एम.एल श्रीवास्तव (संयुक्त सचिव, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार), पूर्व कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ (2018-2023) और वर्तमान कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह (2024 – अभी तक) को जाता है। पूर्व निदेशक प्रो. रविन्द्र पंत जिनके कार्यकाल में नव नालन्दा महाविहार द्वारा भारत के अतिरिक्त 15 अन्य जगहों पर संस्कृति मंत्रालयविदेश मंत्रालय व दूतावास के सहयोग से बुद्धचारिका का प्रदर्शनी लगाया गया। इस कार्यक्रम में के अंतर्गत भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी घटनाएँ शामिल थी। इन स्थानों में चीनथाईलैंडकंबोडियाइंडोनेशिया इत्यादि देश शामिल है। पूर्व कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ ने अपने कार्यकाल में शैक्षणिक व गैर-शिक्षण नियुक्ति के अलावा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सेमिनार व कान्फ्रेंस आयोजित कर महाविहार के विकास को गति दी। एशियन फिलॉसफी कान्फ्रेंस व इंडियन फिलॉसफी कांग्रेस का संयुक्त अधिवेशन यहाँ 2019 में अयोजित हुआ था। इसके अतिरिक्त उन्होंने इस संस्थान को इंडियन सोसाइटी फाॅर बुद्धिस्ट स्टडीज का अकादमिक मुख्यालय भी बनाया। संस्थान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की शुरूआत का भी श्रेय उन्हीं को जाता है। वर्तमान कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने अपने शुरूआती कदम में ही संस्थान में ही NEP 2020 को लागू करते हुए सभी विषयों में, जिनमें परास्नातक उपलब्ध था उनमें कला स्नातक की पढाई शुरू कराने का प्रस्ताव लाया और 2025 से प्रवेश भी शुरू हो चुका हैं। ज्ञात हो कि इस संस्थान में पहले सिर्फ़ पालि में ही स्नातक का विकल्प था। इसके साथ ही 2025 में ही अतिथि प्रवक्ताओं की नियुक्ति के साथ NEP को लागू करते हुए समग्र रूप से आगे ले जाने की पहल की गई है। नव नालन्दा महाविहार को विभिन्न पटलों पर ले जाने के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर संवाद व संबंध स्थापित कर संस्थान को नया आयाम देने का प्रयास जारी है। इनके ही कार्यकाल में नव नालंदा महाविहार को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बिहार का पहला पाण्डुलिपि क्लस्टर केन्द्र बनने का गौरव प्राप्त हुआ है।

निष्कर्ष :-


नव नालन्दा महाविहार ने भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसने नालन्दा की उस आत्मा को पुनर्जीवित किया जो ज्ञान को लोकमंगल की दिशा में प्रयुक्त करती थी। बौद्ध अध्ययनपालि साहित्यअनुसंधान,अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में इसके योगदान ने भारत की प्राचीन ज्ञानगंगा को आधुनिक युग में पुनः प्रवाहित किया है।आज यह संस्थान श्री नालन्दा महाविहार के उत्तराधिकारी के रूप में अपनी अप्रतिम व अद्वितीय सहयोग निरंतर दे रहा है। इस दृष्टि से नव नालन्दा महाविहार न केवल एक विश्वविद्यालय हैबल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवंत विरासत है। इस संस्थान का क्रमिक विकास और गाथा अपने 75 वर्ष की ध्येय यात्रा में यह सुनिश्चित कर रहा है कि यह केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त करने को तैयार है, बशर्ते केन्द्र सरकार और संबंधित लोगों का ध्यान सम्यक दृष्टि से इसकी  जीवंतता पर पड़े।


आपके सुझाव आमंत्रित है।


अंकित द्विवेदी,

शोध छात्र,

बौद्ध अध्ययन विभाग,

नव नालन्दा महाविहार,

संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार,

नालन्दा (बिहार), 803111

Email - apkdwivedee@gmail.com

Mobile- 9570739208

Post a Comment

Previous Post Next Post